/// राहुल अष्ठाना “अजनबी” ///
अजनबी न्यूज शिवपुरी। कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं और उनके हाथों में कलम-किताबें होनी चाहिए। लेकिन मध्य प्रदेश के शिवपुरी शहर की तपती सड़कों और गलियों की हकीकत इस मुहावरे को चिढ़ाती नजर आती है। यहाँ मासूमों के हाथों में आज किताबें नहीं, बल्कि खुद से दोगुनी भारी पानी की कट्टियाँ (प्लास्टिक के डिब्बे) हैं। जीने के लिए सबसे बुनियादी जरूरत—’पानी’—को जुटाने की जद्दोजहद में इन बच्चों का बचपन इस कदर पिस रहा है कि देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए।

कंधों पर बस्ते का नहीं, प्यास का बोझ
शिवपुरी के कई मोहल्लों में सुबह की शुरुआत किसी स्कूल की घंटी से नहीं, बल्कि पानी के टैंकर के आने के शोर और नलों पर लगने वाली अंतहीन लाइनों से होती है। जहाँ उम्र के इस पड़ाव पर इन बच्चों को ककहरा सीखना चाहिए था, वहाँ ये मासूम तपती धूप में, नंगे पैर, अपने सूखे कंठ और सिसकते परिवार के लिए पानी की एक-एक कट्टी ढोते नजर आते हैं।
चेहरे पर मासूमियत और आँखों में भविष्य के सपनों की जगह सिर्फ एक ही फिक्र तैरती है—”क्या आज घर में खाना पकाने और पीने के लिए पर्याप्त पानी मिल पाएगा?”

रूह कंपा देने वाली हकीकत
यह सिर्फ पानी की किल्लत नहीं, बल्कि मासूमियत का कत्ल है। जब एक 7-8 साल का बच्चा अपने वजन से भारी पानी का डिब्बा उठाए, पसीने से लथपथ, हांफते हुए कदम बढ़ाता है, तो वह सिर्फ पानी नहीं ढो रहा होता, बल्कि इस व्यवस्था की नाकामी का बोझ उठा रहा होता है। पानी की हर एक कट्टी के साथ इन बच्चों का खेल, उनकी शिक्षा और उनका बेफिक्र बचपन कहीं बहुत पीछे छूटता जा रहा है।



