करवा चौथ शुक्र वार 10 अक्टूबर
सनातन धर्म में करवा चौथ का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है ।यह पर्व सुहागन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है ।क्योंकि इस दिन पर अपनी पति की लंबी आयु अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती है। महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किये व्रत रखने के बाद शाम को चंद्रमा की पूजा करने के पश्चात अपना व्रत खोलती है ।करवा चौथ को कठोर व्रत में गिना जाता है ।क्योंकि इसमें लगभग 12 घंटे तक निर्जला व्रत रखा जाता है जिसमें ना अन्य ग्रहण किया जाता है और ना ही जल या त्योहार वैवाहिक प्रेम और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है हिंदू पंचांग के अनुसार करवा चौथ हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है इस दिन महिलाएं प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लेती है दिनभर पूजा की सामग्री तैयार करती हैं कथा सुनती है और शाम के समय चंद्रमा निकलने पर उसे आज देकर पूजा संपन्न करती हैं व्रत खोलते समय महिलाएं अपने पति के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत समाप्त करती है इस साल करवा चौथ कार्तिक माह के कारण पक्ष की चतुर्थी तिथि 9 अक्टूबर को शुरू होगा और कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 10 अक्टूबर को शाम 7:38 पर समाप्त होगा करवा चौथ का पूजन 5:16 से शाम 6:29 तक किया जाएगा।
Category: हिस्टोरिकल
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जीवन साथी के मंगल कामना के लिए भारतीय ललनाए रखती हैं करवा चौथ व्रत
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4500 करोड़ के आलीशान जय विलास पैलेस में 400 कमरे, सपनों के महल में शाही ठाठ से रहते हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया
Jyotiraditya Scindia Life Style: केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अलग ही लाइफस्टाइल से जीते हैं. उनका अंदाज और रहने का तरीका सभी से अलग है. वे भारत के सबसे आलीशान महलों में शुमार ग्वालियर के जय विलास पैलेस में रहते हैं. बता दें, इस महल की कीमत 4500 हजार करोड़ रुपये है. यहां सिंधिया पत्नी प्रियदर्शनी बेटे महान आर्यमन और बेटी के साथ रहते हैं. जय विलास महल भारत के सबसे खूबसूरत और भव्य महलों में शुमार है.

सिंधिया राजवंश के शासक जयाजी राव सिंधिया ने सन 1874 जय विलास महल बनवाया था. यूरोपीय वास्तुकला पर आधारित इस महल को फ्रांसीसी आर्किटेक्ट सर माइकल फिलोस ने डिजाइन किया था. विदेशी कारीगरों की मदद से इस महल को चार सौ कमरों के साथ भव्य बनाया गया था. इस महल की पहली मंजिल टस्कन शैली, दूसरी मंजिल इतालवी-डोरिक शैली और तीसरी कोरिंथियन शैली में बनी है. इतावली संगमरमर और फारसी कालीन से महल की सजावट की गई है. महल के दरबार हॉल के अंदरूनी हिस्से को सोने और गिल्ट बनाया गया है.
1874 में बना जय विलास पैलेस 12 लाख 40 हजार 771 वर्ग फीट में फैला है. इसमें चार सौ कमरे हैं. 146 साल पहले बने इस महल के निर्माण में एक करोड़ रुपए खर्च हुआ था. विदेशी कारीगरों की मदद से जय विलास महल को बनाने में 12 साल का समय लगा था. इस महल में साल 1964 में म्युजियम शुरु हुआ था. चालीस कमरों को विजयाराजे सिंधिया ने म्युजियम में तब्दील कराया था. महल की दूसरी मंजिल पर बना दरबार हाल जयविलास की शान कहा जाता है. दरबार हाल की दीवारों और छत को पूरी तरह सोने-हीरे-जवाहरात से सजाया गया था.

दरबार हाल की छत पर दुनिया का सबसे बड़ा वजनी झूमर लगाया गया है. साढ़े तीन हजार किलो के झूमर को लटकाने से पहले कारीगरों ने छत की मजबूती को परखा. इसके लिए छत के ऊपर नौ से दस हाथियों को खड़ा किया गया. दस दिन तक छत पर हाथी चहलकदमी करते रहे. जब छत मजबूत होने का भरोसा हो गया तब फ्रांस के कारीगरों ने इस झूमर को छत पर लटकाया.
रिसायत कालीन दौर में जब भी कोई राजप्रमुख या बड़ी शख्सियत ग्वालियर आते थे तो उनका खास स्वागत दरबार हाल में ही किया जाता था. आज जब कोई दरबार हाल में आता है तो इसका वैभव देखते ही रह जाता है. देखने वालों को न सिर्फ दरबार हाल, बल्कि अपने राजा महाराजाओं पर भी गर्व महसूस होता है. जयविलास पैलेस का शाही डायनिंग हाल राजसी वैभाव की निशानी है. इसके आसपास एक वक्त में पचास से ज्यादा शाही लोग भोजन करते थे. खास बात ये है कि भोजन के दौरान परोसने के लिए कोई कर्मचारी नहीं, बल्कि चांदी की खूबसूरत ट्रेन भोजन परोसती थी. ट्रेबल पर ट्रेन के लिए बकायदा पटरी बनी हुई है.
दरबार हाल, डायवनिंग हाल के अलावा यहां भारतीय भोजन दरबार भी है. इसमें मेहमानों को फर्श पर बैठकर सोने-चांदी के बरतनों में भोजन कराया जाता था. इसमें राजा के लिए बड़ा आसान लगाया जाता था. महल में राजा-महाराजा के वाहन, राज दरबार, बैठक हॉल सहित सभी चीजें देखने लायक हैं. महल में संग्राहालय का ये हिस्सा आज भी शाही मराठा सिंधिया राजवंश के निवास के रूप में जाना जाता है.

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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल तालाबों का शहर
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल तालाबों का भी शहर कहलाता है। यहाँ बहुत सारे तालाब पर्यटक स्थल के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें से बड़ा तालाब सबसे प्रमुख है। भोपाल में इस तालाब के लिए कहा भी जाता है, “तालों में ताल भोपाल का ताल बाकी सब तलैया”, अर्थात यदि सही अर्थों में तालाब कोई है तो वह है भोपाल का तालाब। भोपाल के पश्चिमी भाग में स्थित यह तालाब, यहाँ के निवासियों का मुख्य जल स्रोत भी है जो यहाँ की लगभग 40% जनसंख्या को रोज़ पानी की सुविधा प्रदान करता है। इस बड़े तालाब के साथ, एक छोटा तालाब भी यहाँ है और यह दोनों तालाब मिलकर एक विशाल “भोज वेटलैण्ड” का निर्माण करते हैं।

कई प्रजाति के पक्षियों का भी बसेरा: बड़ा तालाब
आप जब कभी भी भोपाल की यात्रा पर जाएँ तो इस बड़ा तालाब की सैर पर ज़रूर जाएँ जो यहाँ मुख्य आकर्षण का केंद्र है। बड़ा तालाब मानव निर्मित तालाबों में से एक और राजा पमारा राजा भोज को समर्पित है।
बड़ा तालाब से जुड़ी कथा
कहा जाता है कि यह भोजताल और भोज वेटलैण्ड, मालवा राजा पमारा राजा भोज द्वारा बनवाया गया था, जिसके नाम पर ही भोपाल शहर का शुरुआत में नाम भोजपाल रथा गया था।
इस तालाब को क्यूँ बनाया गया? हर निर्माण के पीछे एक कारण और कहानी जुड़ी होती है, उसी तरह इस तालाब को बनाने के पीछे भी एक कहानी है। इतिहास के अनुसार कहा जाता है कि बड़ा तालाब तब बनाया गया जब राजा भोज बहुत गंभीर त्वचा विकार से ग्रस्त हुए। कई वैद्यों से परामर्श लिया गया पर कोई उनकी इस बीमारी को ठीक ना कर सका। तब एक साधु ने उन्हें एक बड़ा सा तालाब बनाने को कहा, जिसमे 365 सहायक नदियों को जोड़ने को कहा और फिर उसके बनने के बाद उसमे डुबकी लगाने से उनकी ये बीमारी ख़त्म हो जाएगी, ऐसा उपाय बताया।
राजा ने अपने गोंड सेनाध्यक्ष कालिया के साथ मिलकर भाद्भाड़ा पर बने बड़े टैंक वाली जगह को ढूंढा जहाँ 365 सहायक नदियाँ एक जगह मिलती हैं। इस तालाब में राजा भोज की हाथ में तलवार लिए एक प्रतिमा भी खड़ी है, जिनकी वजह से तालाबों के शहर भोपाल की स्थापना हुई थी। साल भर यहाँ पर्यटक इसके प्राकृतिक दृश्य का आनंद उठाने आते हैं और कई सारे रोमांचक खेलों और क्रियाओं का भी लुत्फ़ उठाते हैं। कायकिंग, कैनोयिंग, राफ्टिंग, वॉटर राफ्टिंग, स्कीइंग आदि जैसी क्रियाएँ यहाँ के बोट क्लब में नैशनल स्कूल सेलिंग द्वारा आयोजित की जाती हैं।
तालाब के ही दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित वन विहार, पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। आपको यहाँ कई तरह की वनस्पतियों के साथ साथ पक्षियों, जैसे वाइट नेकेड स्टॉर्क,स्पूनबिल्स और कई तरह के सारस जैसी प्रजातियों को देखने का सुखद अनुभव प्राप्त होगा। तो अब जल्द ही योजना बनाइए भारत के इस बड़े तालाब का खुद से अनुभव करने का और अपनी यात्रा के अनुभव में कुछ और शब्द जोड़िए।
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क्या हुआ जब नासा ने कैलाश पर्वत पर सैटेलाइट भेजा | NASA and Kailash Parvat
क्या सच में कैलाश पर्वत पर भोलनाथ रहते हैं या फिर ये एक कल्पना मात्र है। क्या हुआ जब नासा ने कैलाश पर्वत पर सैटेलाइट भेजा। आखिर क्यों सभी नदियों का उद्घम स्थल कैलाश पर्वत है। आज आपको सभी सवालों के जवाब और कैलाश पर्वत के बारे में विस्तार से बताएंगे। माउंट एवरेस्ट जो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है उस पर अब तक 7 हजार लोग चढ़ाई कर चुके हैं। लेकिन इससे 2200 मीटर कम ऊंचाई वाले कैलाश पर्वत पर आज तक कोई फतह हासिल नहीं कर पाया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस पर्वत के पास प्राचीन धन कुबेर की नगरी है। मान्यता तो ये भी है कि जो व्यक्ति अपने जीवनकाल में अच्छे और पुण्य कर्मों को करता है। मृत्यु के बाद उसकी आत्मा को कैलाश पर्वत पर स्थान प्राप्त होता है।
शिव का निवास स्थान कैलाशपिरामिड के आकार का पवित्र पर्वत, ‘कैलाश पर्वत’ सिर्फ एक पर्वत नहीं है, यह भगवान शिव का पवित्र निवास है, जिस पर आम आदमी का चढ़ना नामुमकिन है। एक ऐसा पहाड़ जिसके ऊपर हवाई जहाज तो नहीं उड़ सकता लेकिन पक्षी उड़ सकते हैं! नासा के साथ कई रूसी वैज्ञानिकों ने कैलाश पर्वत पर अपनी रिपोर्ट पेश की है। उन सभी का मानना है कि कैलाश वाकई कई अलौकिक शक्तियों का केंद्र है। विज्ञान ये दावा तो नहीं करता है कि यहां शिव देखे गए हैं। किन्तु ये सभी मानते हैं कि यहां पर कई पवित्र शक्तियां जरूर काम कर रही हैं। हिंदू धर्म में भी इसे पारंपरिक रूप से शिव के निवास के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो अपनी पत्नी देवी पार्वती और अपने बच्चों, गणेश और कार्तिकेय के साथ वहां रहते थे।
पृथ्वी का केंद्र कैलाशपृथ्वी के एक तरफ उत्तरी ध्रुव है और दूसरी तरफ दक्षिणी ध्रुव है। दोनों के मध्य में स्थित है हिमालय और हिमालय का केंद्र है कैलाश पर्वत। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पृथ्वी का केंद्र है। कैलाश पर्वत दुनिया के 4 प्रमुख धर्मों- हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म का केंद्र है। वैज्ञानिकों के अनुसार कैलाश पर्वत धरती का केंद्र है, जिसे विज्ञान की भाषा में एक्सिस मुंडी कहते हैं। इसका मतलब दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र से है। रशिया के कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार एक्सिस मुंडी वह स्थान है, जहां अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है। यही नहीं, इस जगह को लेकर लोगों ने दावा भी किया कि उन्हें यहां पर साक्षात शिव के दर्शन हुए हैं।
क्या यह पिरामिड है?
कैलाश पर्वत की आश्चर्यजनक विशेषताओं को समझने के लिए इस पर बहुत सारे वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। रूसी वैज्ञानिकों ने एक बार दावा किया था कि कैलाश पर्वत वास्तव में एक मानव निर्मित पिरामिड है और यह ब्रह्मांड का केंद्र है! क्या इसके निर्माण के लिए अतिमानव जिम्मेदार हैं? हम वास्तव में नहीं जानते! कैलाश के पास के सभी पर्वतों की चोटियाँ नुकीली हैं लेकिन कैलाश ऊपर से घुमावदार और शिवलिंग के आकार का है। जब अन्य पहाड़ों पर बर्फ नहीं होगी तब भी आप कैलाश पर ये मानो भगवान शिव का जलाभिषेक करती नजप आएंगी।
कैलाश पर्वत स्थिति बदलने के लिए जाना जाता है
इस पर्वत की एक और रहस्यमय विशेषता यह है कि यह स्थान बदलने के लिए जाना जाता है! हतप्रभ पर्वतारोही जिन्होंने इसके शिखर तक पहुंचने की कोशिश की थी, वे अपने अभियान के दौरान समय और स्थान का ध्यान नहीं रख पाए और इस तरह वापस लौट आए! पर्वतारोहियों ने बताया कि जब भी वे शिखर पर पहुंचने वाले होते थे, शिखर अपनी स्थिति बदल लेता था।
ॐ का जाप
जब तीर्थयात्री इस क्षेत्र में होते हैं तो उन्हें अक्सर ओम के कंपन और ध्वनि का अनुभव होता है। इसके लिए कोई वैज्ञानिक स्पष्टीकरण नहीं है, हालांकि विश्वासियों का मानना है कि यह भगवान शिव, शाश्वत योगी हैं, जो ‘ओम’ का जप करते हैं। कैलाश यात्रा वास्तव में एक ऐसी यात्रा है जिस पर प्रत्येक हिंदू को कम से कम एक बार अवश्य जाना चाहिए। इस क्षेत्र की रहस्यमयता, शांति, शांति और सुंदरता की कोई सीमा नहीं है। कैलाश पर्वत का एक और रहस्य ये भी है कि जब वहां बर्फ पिघलती है तो डमरू के बजने जैसी आवाज आती है। इसे कई लोगों ने सुना है। लेकिन ये आवाज कहां से और कैसे आती है। इसका स्रोत नहीं पता चल सका है।
पर्वत के पास चमकती रोशनी
दावा किया जाता है कि कई बार कैलाश पर्वत पर आसमान में 7 तरह की रोशनी चमकती देखी गई है। नासा के वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा यहां की चुंबकीय शक्ति के कारण हो सकता है। यहां की चुंबकीय शक्ति आकाश से मिलकर कभी-कभी ऐसी चीजें बना सकती है। माना जाता है कि अलौकिक शक्ति का इस्तेमाल आज भी कुछ तपस्वी आध्यात्मिक गुरुओं से संपर्क में रहते हैं। कैलाश पर्वत केवल अपनी अलौकिक शक्तियों के लिए ही नहीं बल्कि अपनी बनावट के लिए भी जाना जाता है।
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THE GWALIOR FORT : ग्वालियर का क़िला
ग्वालियर दुर्ग ग्वालियर शहर का प्रमुखतम स्मारक है। यह किला ‘गोपाचल’ (गोप + अचल = गोपाचल) गोप पर्वत नामक पर्वत पर स्थित है। स्थानीय किंबदन्तियों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण करने वाले पहले राजा ९वीं शताब्दी में राजा मान सिंह तोमर ने इसका निर्माण करवाया। भिन्न कालखण्डों में इस पर विभिन्न शासकों का नियन्त्रण रहा। हाथीफोड दरवाजे का निर्माण महारानी वर्षाकरन देवी के द्वारा करवाया गया था ।वर्ततमान समय में यह दुर्ग एक पुरातात्विक संग्रहालय के रूप में है। इस दुर्ग में स्थित एक छोटे से मन्दिर की दीवार पर शून्य (०) उकेरा गया है जो शून्य के लेखन का दूसरा सबसे पुराना ज्ञात उदाहरण है। यह शून्य आज से लगभग १५०० वर्ष पहले उकेरा गया था।

परिचय
लाल बलुए पत्थर से बना यह किला की नीव सूरजसेन कच्छवाहा ने रखी जिसे बाद में मान सिंह तोमर ने किले का रूप दिया। एक ऊंचे पठार पर बने इस किले तक पहुंचने के लिये दो रास्ते हैं। एक ‘ग्वालियर गेट’ कहलाता है एवं इस रास्ते सिर्फ पैदल चढा जा सकता है। गाडियां ‘ऊरवाई गेट’ नामक रास्ते से चढ सकती हैं और यहां एक बेहद ऊंची चढाई वाली पतली सड़क से होकर जाना होता है। इस सड़क के आर्सपास की बडी-बडी चट्टानों पर जैन तीर्थकंरों की अतिविशाल मूर्तियां बेहद खूबसूरती से और बारीकी से गढ़ी गई हैं। किले की तीन सौ पचास फीट उंचाई इस किले के अविजित होने की गवाह है। इस किले के भीतरी हिस्सों में मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूने स्थित हैं। १५वीं शताब्दी में निर्मित गुजरी महल उनमें से एक है जो राजा मानसिंह और रानी मृगनयनी के गहन प्रेम का प्रतीक है। इस महल के बाहरी भाग को उसके मूल स्वरूप में राज्य के पुरातत्व विभाग ने सप्रयास सुरक्षित रखा है किन्तु आन्तरिक हिस्से को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया है जहां दुर्लभ प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं जो कार्बन डेटिंग के अनुसार प्रथम शती ईस्वी की हैं। ये दुर्लभ मूर्तियां ग्वालियर के आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त हुई हैं।पिछले 1000 वर्षों से अधिक समय से यह किला ग्वालियर शहर में मौजूद है। भारत के सर्वाधिक दुर्भेद्य किलों में से एक यह विशालकाय किला कई हाथों से गुजरा। इसे बलुआ पत्थर की पहाड़ी पर निर्मित किया गया है और यह मैदानी क्षेत्र से 100 मीटर ऊंचाई पर है। किले की बाहरी दीवार लगभग 2 मील लंबी है और इसकी चौड़ाई 1 किलोमीटर से लेकर 200 मीटर तक है। किले की दीवारें एकदम खड़ी चढ़ाई वाली हैं। यह किला उथल-पुथल के युग में कई लडाइयों का गवाह रहा है साथ ही शांति के दौर में इसने अनेक उत्सव भी मनाए हैं। इसके शासकों में किले के साथ न्याय किया, जिसमें अनेक लोगों को बंदी बनाकर रखा। किले में आयोजित किए जाने वाले आयोजन भव्य हुआ करते हैं किन्तु जौहरों की आवाज़ें कानों को चीर जाती है।The Gwalior Fort

Standing on a steep mass of sandstone, Gwalior Fort dominates the city and is its most significant monument. It has been the scene of momentous events, imprisonment, battles and jauhars . A steep road winds upwards to the fort, flanked by statues of the Jain tirthankaras, carved into the rock face. The magnificent outer walls of the fort still stand, two miles in length and 35 feet high, bearing witness to its reputation for being one of the most invincible forts of India. This imposing structure inspired Emperor Babur to describe it as ” the pearl amongst the fortresses of Hind “.Within the fort are some marvels of medieval architecture. The 15th century Gujari Mahal is a monument to the love of Raja Mansingh Tomar for his intrepid Gujar Queen, Mrignayani. The outer structure of Gujari Mahal has survived in an almost total state of preservation; the interior has been converted into Archaeological Museum housing rare antiquities,some of them dating back to the 1st century A.D. Even though many of these have been defaced by the iconoclastic Mughals , their perfection of form has survived the ravages of time. Particularly worth seeing is the statue of Shalbhanjika from Gyraspur, the tree goddess, the epitome of perfection in miniature . The statue is kept in the custody of the museum’s curator, and can be seen on request
Photo Gallery
How to Reach:
By Air
At present there are daily flights,seven days a week from Delhi and Indore to Gwalior .But these are subject to change so please check beforehand.By Train
Gwalior lines on the main Delhi-Mumbai and Delhi-Chennai lines. The super fast shatabdi express connect it daily to Delhi Delhi,Agra,Jhansi and Bhopal. The railway station lines to the southeast of the fort area.By Road
MP State Bus Stand is on Link Road near the Railway station, while the privat bus stand is in Lashkar.ग्वालियर का किला:
ग्वालियर का किला भारत के सबसे पुराने किलों में से एक है। यह भारत का तीसरा सबसे पुराना किला है। यह लगभग 3 किलोमीटर में फैला हुआ है। इस किले का निर्माण सन 727 ईस्वी में सूर्यसेन नामक एक स्थानीय सरदार ने कराया। इस किले पर कई राजपूत राजाओं ने शासन किया। यह किला मध्य प्रदेश राज्य के ग्वालियर शहर में स्थित है। यहाँ ग्वालियर के किले के बारे में विस्तृत जानकारी दी जा रही है। ग्वालियर के किले का इतिहास
ग्वालियर के किले की शिल्पकाल
ग्वालियर के किले के दर्शनीय स्थल
जौहर कुंड
गुजरी महल
सास बहु का मंदिर (पद्मनाभ मंदिर)
जैन मंदिर
तेली का मंदिर
ग्वालियर के किले का इतिहास
ग्वालियर के किला की नींव सूरजसेन कच्छवाहा ने रखी जिसे बाद में मान सिंह तोमर ने किले का रूप दिया। इस किले पर कई राजपूत राजवंशों का शासन रहा है, किले की स्थापना के बाद लगभग 989 वर्षों तक यह पाल वंश के राजाओं द्वारा शासित रहा। इसके बाद प्रतिहार वंश ने शासन किया। इस किले पर 1023 में मोहम्मद ग़ज़नी ने हमला किया लेकिन वह हार गया। गुलाम वंश के संस्थापक कुतुबुद्दीन इबक ने 12 वीं शताब्दी में किले पर विजय प्राप्त की, लेकिन 1211 ईस्वी में वह हार गया।इसके बाद 1231 में गुलाम वंश के शासक इल्तुतमिश ने इस पर कब्ज़ा कर लिया। बाद में उसे तोमर राजा देववरम ने हरा दिया और किले पर कब्ज़ा करने के बाद ग्वालियर शहर में तोमर वंश की स्थापना की। इसके बाद इस किले को बाबर ने अपने अधीन किया लेकिन उसके बाद शेर शाह सूरी ने उसे हराकर ग्वालियर किले को अपने नियंत्रण में ले लिया। 1736 से 1756 तक राजा महाराजा भीम सिंह राणा ने इस किले को अपने अधीन रखा उसके बाद 1779 और 1844 के बीच अंग्रजों और सिन्धिया वंश के मध्य किले पर शासन बदलता रहा और फिर 1844 में महाराजपुर की लड़ाई के बाद पूर्ण रूप से यह किला सिन्धिया वंश ने अपने अधिपत्य में ले लिया।
ग्वालियर के किले की शिल्पकाल
ग्वालियर का किला अपनी शिल्पकाल के कारण सदैव दर्शनीय स्थल रहा है। इस किले के अंदर बनी सुंदर मूर्तियां, दीवारों और स्तम्भों पर उकेरी गईं सुंदर कलाकृतियां पहली नज़र में ही देखने वालों का मन मोह लेती हैं। यहाँ ग्वालियर के किले की शिल्पकारी से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताया जा रहा है :किले अंदर स्थित जैन धर्म की विशाल प्रतिमाओं को पत्थरों को काटकर बनाया गया है। इन दुर्लभ प्रतिमाओं में कई ऐसी प्रतिमाएं हैं, जो विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलतीं। ग्वालियर के किले में स्थित मंदिर में रखी देवी देवताओं की मूर्तियों में उनके ध्यान रूप, अध्यात्म रूप और उनकी कायोत्सर्गा मुद्रा को भी दर्शाया गया है। इस किले के अंदर दुर्लभ जैन प्रतिमाएं मौजूद हैं, जो गोपाचल पर्वत के दोनों ओर बनाई गई हैं। ये मूर्तियां मध्यकालीन शिल्पकला का लाजवाब उदाहरण हैं।
ग्वालियर के किले के दर्शनीय स्थल
ग्वालियर के किले के अंदर बहुत से दर्शनीय स्थल मौजूद हैं। इन में से कई मंदिर और कई ऐतिहासिक स्थल हैं। यहाँ ग्वालियर के किले के दर्शनीय स्थलों के बारे में बताया जा रहा है :जौहर कुंड
जौहर कुंड राजपूत स्त्रियों की वीरता की कहानी बताता है। यह उनके बलिदान का प्रतीक है। सन 1232 में इल्तुतमिश ने राजा को हराकर ग्वालियर के किले पर कब्ज़ा कर लिया था। इसके बाद राजपूत स्त्रियों ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए आग में कूदकर आत्मदाह कर लिया था।गुजरी महल
गुजरी महल एक म्यूज़ियम है। इसे राजा मान सिंह ने अपनी रानी मृगनयनी के लिए बनवाया था। संग्रहालय में दुर्लभ कलाकृतियों में पहली और दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की हिंदू और जैन मूर्तियां शामिल हैं: सालभंजिका लघु प्रतिमा, टेराकोटा आइटम और बाग गुफाओं में देखी गई भित्तिचित्रों की प्रतिकृतियां।सास बहु का मंदिर (पद्मनाभ मंदिर)
इस मंदिर का निर्माण 1093 ईस्वी में हुआ था। इस मंदिर में राजा और रानी की पूजा की जाती थी। इस कारण से इसे सास बहु का मंदिर कहा जाने लगा। इस मंदिर में बहुत सुंदर नक्काशी की गई है।जैन मंदिर
ग्वालियर किले के अंदर जैन तीर्थंकरों को समर्पित ग्यारह जैन मंदिर हैं। दक्षिण की ओर के 21 मंदिरों को तीर्थंकरों की नक्काशी द्वारा पत्थर में तराशा गया है।तेली का मंदिर
ग्वालियर के किले में स्थित जैन के मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में प्रतिहार वंश के शासक मिहिर भोज ने कराया था। ये मंदिर भारतीय शैली में बनाया गया है। इसकी ऊंचाई 90 फ़ीट के आसपास है।ग्वालियर का किला भारत का जिब्राल्टर क्यों कहा जाता है?
ग्वालियर किले को भारत का जिब्राल्टर कहा गया है, क्योंकि इस किले को कई सीधी लड़ाई में जीता नहीं जा सका। जब भी इस किले पर किसी आक्रमणकारी का कब्जा हुआ तो उसकी वजह विश्वासघात या सालों की घेराबंदी के बाद किले पर काबिज राज सत्ता का मजबूरी में किया गया समर्पण ही रहा था।ग्वालियर के अंतिम राजा कौन थे?
ग्वालियर के अंतिम राजा जीवाजीराव थे।ग्वालियर किले में कितने मंदिर हैं?
ग्वालियर के किले में कुल 32 मंदिर स्थित हैं।