
// डा. अजय खेमरिया//
लेखक, आयुक्त (निशक्तजन)
अजनबी न्यूज संपादकीय। बिहार विधानसभा के चुनाव परिणामों के बाद मैथिली ठाकुर संभवत एक मात्र विधायक हैं जो सोशल मीडिया पर सर्वाधिक ट्रेंड हुई हैं।एक बड़ा वर्ग उनके पक्ष में खड़ा है तो इतना ही बड़ा वर्ग उनके चरित्रहनन अभियान युद्धस्तर पर चला रहा है।सोशल मीडिया पर ए आई से बनाये गए ऐसे ऐसे फोटो और वीडियो इस समय मौजूद है जिनकी चर्चा करना भी हम भारतीय अपने पारिवारिक वातावरण में पसन्द नही करते हैं।मासूम सा निर्मल चेहरे लिए मिथिला की इस बेटी का वैशिष्ट्य भाजपा विधायक बनना नही है उनका असल व्यक्तित्व तो बिटिया के रूप में हमारी सनातन संस्कृति की ब्रांड एम्बेसडर होना ही है।तो क्या मैथिली का भजन गायक होना उनका सबसे बड़ा अपराध है?

सच्चाई यह है कि इस देश ने मैथिली को बुमिश्कल मौजूदा एक दशक में ही प्रतिष्ठित होते देखा है। यू ट्यूब के जरिये देश दुनिया में उनके प्रशंसक प्रशंसको की संख्या बढ़ रही थी, इसी दौरान उन्हें बड़े मंचों से अवसर मिल रहे थे। लोगों को उसके गायन से अधिक उसकी सहजता पसन्द आ रही थी। एक दुबली पतली सी सामान्य लड़की, जो सुन्दर दिखने के प्रयोगों से दूर केवल अपने सङ्गीत के लिए समर्पित थी।इस सीधी साधी लड़की में भारत का मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार अपनी बिटिया का अक्स आज भी देखता है।
वह सौंदर्य उत्पादों के बाजार का हिस्सा नही है।वह जेंडर और नारीवादी विमर्श के केंद्रीय तत्व रिश्तों से आजादी और देह की प्रधानता में भरोसा नही करती है।जेंडर की आजादी का मतलब ही भाई, पिता परिवार के बंधनों से मुक्ति है। लेकिन हमने देखा है मैथिली अपने भाईयों और पिता के साथ भरोसे के सूत्र में बंधकर ही इस पहचान को अर्जित कर पाई है।

जिस दौर में लोक संगीत का मतलब ही अश्लील, असभ्य, फूहड़ तुकबंदी और कर्कश स्वर है, उस दौर में साफ सुथरे गीतों की सबसे प्रसिद्ध गायिका है मैथिली। उनकी छवि एक साफ सुथरी गायिका की है, और बस इतनी ही है…
वह फेमिनिज्म,पितृ सत्ता और माय बॉडी माय चॉइस जैसे विघटनकारी विमर्श से दूर शालीनता और सौम्यता के साथ भजन गायन कर करोड़ों दिलों में जगह बनाती हैं।क्या यही एक कारण है कि मैथिली को लेकर जब सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चरित्रहनन का दौर शुरू हुआ तो नारीवादी विमर्श के ठेकेदारों ने मुँह में दही जमा लिया है।क्या जेएनयू में ढपली लेकर भारतीय लोक परम्पराओं को गाली देने वालीं,सिगरेट के छल्ले उड़ाने वाली महिलाओं के लिए ही भारत की फेमिनिस्ट जमात सक्रिय होती हैं।साड़ी, बिंदी,चूड़ी,सिंदूर वाली महिलाएं प्रगतिशील-वामपंथ को स्वीकार ही नही है।यह भारतीय नारी विमर्श के वामपंथी चरित्र का निकृष्टतम दोगलापन है। सोशल मीडिया में रोज हजारों लोग उसकी तस्वीरें लगा कर अश्लील पोस्ट लिख रहे हैं और उसपर हजारों गन्दी टिप्पणियां बरस रही हैं। क्यों? केवल इस कारण कि उसने एक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ लिया। उसे गाली देने वाले लोग कौन है? वे जिन्हें यह सरकार पसन्द नहीं है, इसे वोट देने वाले लोग पसन्द नहीं हैं।एक बात भारत के फेमेनेजिम और नारीवाद को समझ लेना चाहिए कि मैथिली नए भारत की अभिव्यक्ति भी है।आप जेएनयू तक इसीलिए सिमट गए हो क्योंकि आपका चरित्र दोगला है।आपका नारीवाद सिलेक्टिव और पोलिटिकल करेक्टनेस के कैंसर का शिकार है।
पुनश्च:मैथिली मतलब माता सीता भी होता है।यह कोई तुलना नही है बस प्रतीक के महत्व की बात है।
मैथिली जिनकी महिमा तुलसीदास जी ने यूं लिखी है:
“जनकसुता जग जननी जानकी।
अतिसय प्रिय करुणानिधान की।”

-इसे समझ लीजिये लंपट नारीवादियों।

