– कलेक्टर से गुहार: “साहब! एकमुश्त 10 लाख दिलवा दीजिए, वरना सांसें थम जाएंगी”
– उदयपुर के अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे 72 वर्षीय वृद्ध; हर हफ्ते सिर्फ 1,000 रुपये दे रहा जिला सहकारी बैंक, इलाज के अभाव में डायलिसिस रुकने की नौबत
/// राहुल अष्ठाना “अजनबी” ///
अजनबी न्यूज शिवपुरी।एक तरफ सरकारें वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और बेहतर इलाज के बड़े-बड़े दावे करती हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक तंत्र और बैंकिंग नियमों की बेरहमी एक बुजुर्ग की जिंदगी पर भारी पड़ रही है। शिवपुरी के पूर्व निवासी एवं वर्तमान में उदयपुर (राजस्थान) में रह रहे 72 वर्षीय युगल कुमार जोशी पिछले चार वर्षों से गंभीर बीमारी (किडनी फेलियर) से जूझ रहे हैं। उनका इलाज पेसिफिक मेडिकल कॉलेज, जीबीएच अमेरिकन हॉस्पिटल उदयपुर और एंजेल विंग्स राजसमंद में लगातार चल रहा है। लेकिन विडंबना देखिए, जिस बुजुर्ग ने अपनी गाढ़ी कमाई और शिवपुरी स्थित अपना इकलौता मकान बेचकर पाई-पाई जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित शिवपुरी में जमा की थी, आज वही बैंक उनके अपने ही पैसे देने में आनाकानी कर रहा है।
जीवनभर की कमाई जमा, पर इलाज के लिए तरस रहे
पीड़ित युगल कुमार जोशी और उनकी पत्नी श्रीमती मधु जोशी (65 वर्ष) का संयुक्त खाता (खाता क्र. 172001462358 एवं 672063042835) जिला सहकारी बैंक शिवपुरी में है। खाते में पर्याप्त जमा राशि होने के बावजूद बैंक प्रबंधन द्वारा उन्हें प्रति सप्ताह मात्र 1,000 रुपये की सीमा तय कर दी गई है।
बेटी हर्षिता जोशी ने भर्राई आवाज में बताया कि उनके पिता का हर दूसरे-तीसरे दिन डायलिसिस होता है। दवाइयों, अस्पताल के बिलों और डॉक्टर की फीस के लिए तत्काल भारी राशि की आवश्यकता है। परिवार ने इलाज का खर्च उठाने के लिए अपना शिवपुरी का मकान तक बेच दिया था, लेकिन अब वही राशि बैंक के कागजी नियमों के जाल में फंस गई है।
हमारे ही जमा रुपयों में से हफ्ते के सिर्फ 1,000 रुपये की भीख जैसी रकम थमा देता है बैंक..
बेटी हर्षिता का कहना है कि पापा की किडनी खराब है, हफ़्ते में कई बार डायलिसिस होता है। डॉक्टर पैसे मांगते हैं और बैंक वाले अपने ही जमा रुपयों में से हफ्ते के सिर्फ 1,000 रुपये की भीख जैसी रकम थमा देते हैं। क्या शिवपुरी से उदयपुर 1,000 रुपये लेने कोई ट्रेन पकड़कर आएगा? क्या 1,000 रुपये में किसी का डायलिसिस और इलाज हो सकता है? अगर इलाज के अभाव में मेरे पापा को कुछ हो गया, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?” साथ ही हर्षिता का यह भी कहना था कि हम राजस्थान के उदयपुर में रहते हैं। हर हफ्ते 1000 रुपये निकालने के लिए शिवपुरी आना-जाना ही हजारों रुपये का पड़ जाएगा। पापा की स्थिति बेहद नाजुक है। हम कोई लोन या सरकारी मदद नहीं मांग रहे, हम सिर्फ अपना ही हक मांग रहे हैं ताकि पापा का इलाज रुकने न पाए।

यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता पर करारा तमाचा है। क्या किसी गंभीर मरीज के इलाज के लिए बैंक के निकासी नियम मानवीय आधार पर शिथिल नहीं किए जा सकते? यदि समय पर पैसे न मिलने के कारण मरीज को कोई अनहोनी होती है, तो क्या बैंक प्रबंधन इसकी जिम्मेदारी लेगा? क्या जिला प्रशासन इस मार्मिक अपील पर संज्ञान लेकर तुरंत आपातकालीन फंड की निकासी सुनिश्चित कराएगा?
शिवपुरी की जनता और पीड़ित परिवार अब केवल जिलाधीश महोदय के मानवीय हस्तक्षेप की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।

